कुछ बातें ऊपर वाले पर ही छोड़नी पड़ती हैं
हम हर बात को लेकर जीत नहीं सकते
कभी कभी हार भी माननी पड़ती है
समय बड़ा बलवान होता है
हर घाव को ठीक करता है
मायूस ना हो हार के तकदीर की बाज़ी
प्यारा है वो गम जिसमे हो भगवान भी राज़ी
दुख दर्द मिले जिसमें वही प्यार अमर है
इंसाफ का मंदिर है ये भगवान का घर है
कहना है जो कह दे तुझे किस बात का डर है
है खोट तेरे मन में जो भगवान से है दूर
है पांव तेरे फिर भी तू आने से है मजबूर
हिम्मत है तो आजा ये भलाई की डगर है
इंसाफ का मंदिर है ये.....
दुख देके जो दुखिया का ना इंसाफ करेगा
भगवान भी उसको ना कभी माफ करेगा
ये सोच ले हर बात बात की दाता को खबर है
इंसाफ का मंदिर है ये.....
है पास तेरे जिसकी अमानत उसे दे दे
निर्धन भी है इंसान मोहब्बत उसे दे दे
जिस दर पे सभी एक हैं बंदे ये वो दर है
इंसाफ का मंदिर है ये.....
बोल: शकील बदायुनी जी
संगीत: नौशाद जी
गायक: मोहम्मद रफी जी
किरदार निभाया दिलीप कुमार उर्फ यूसुफ साहब ने
फिल्म अथवा रिकॉर्ड - अमर - 1954
उपरोक्त गीत में एक मजे की बात बताऊं
गाना गाया गया भगवान और मंदिर पर और सारे किरदार यानी बोल लिखने वाले, संगीत देने वाले, गाने वाले, और अदाकार, ये सारे ही मुसलमान
कितना महान साजो सामान इकठ्ठा कर तैयार किया गया ये फूलों का गुलदस्ता
तो आज 2018 में जब मैं टेलीविजन पर मीडिया वालों को हिन्दू और मुसलमान के नुमाइंदों को आपस में लड़वाते हुए देखता हूं तो मुझे इन सब पर बड़ा तरस आता है।।