हम हाथ धोते हैं, नहाते हैं, साफ सुथरा होने के लिए। अच्छी बात है। होना भी ऐसे ही चाहिए।
लेकिन क्या हमें एहसास है कि जल भी तो दूषित हो रहा है। और जल को साफ करने की विधि एवम प्रक्रिया बहुत ही लंबी और इंसान के लिए लगभग असंभव है। मसलन नदियों का प्रदूषण कोई भी देश साफ नहीं कर पाता है चाहे हिंदुस्तान, चीन हो या यूरोप अमरीका।
फिर भी नदियों, झीलों, झरने, समुन्द्र को गंदा और प्रदूषित करने में सब एक से एक आगे हैं।
लिहाजा कम से कम इस्तेमाल करें ये व्यर्थ के पदार्थ तो भगवान बुरा नहीं मानेगा, अपितु खुश ही होगा क्योंकि इनसे पानी में सिर्फ ऐसिड और जहर ही बनता है जैसे साबुन, शैम्पू, फिजूल के सौंदर्य संसाधन जो किसी काम के नहीं, और डिटर्जेंट इत्यादि।
अब रही बात फैक्ट्री और उद्योगों के प्रदूषण की। तो इसकी भी कारगर नीति पर अमल होना चाहिए जो सबके लिए फायदेमंद हो और किसी को भी नुकसान ना हो। क्योंकि उद्योग किसी एक के लिए नहीं है, वो सबके लिए ही होता है। रोजगार भी मिलता है और कारगर वस्तुएं भी।
और फिर जो जीव जन्तु इन जलाशयों और नदियों में रहते हैं, उन्हें भी जीने का अधिकार है कि नहीं?