किसी ने मुझसे पूछा कि पार्क तो मेरे घर के आसपास है नहीं तो मैं क्या करूं
मैंने कहा:
पार्क नहीं तो क्या हुआ
छत तो है ना
और इसमें एकांत,
अकेलापन बहुत जरूरी है
ज्यादा से ज्यादा एक घंटा
एक घंटे से ऊपर कभी नहीं
छत का भी अपना ही मजा है जी
बदलता है रंग आसमां कैसे कैसे
कभी बादलों का झुरमुट
कभी सूरज की आग
छांव में बैठ जाना
या छाता लगा लेना
या जाना सुबह या शाम
या रात हो जाए
तो देखना चांद तारे
या रात के काले बादल
जो तारों को रौशनी को छुपाकर
और भी काले हो जाते हैं।
कहने का तात्पर्य ये है कि प्रकृति, मकान, गली हो या सड़क, इनके बदलते हुए रंगों का भी आनंद लीजिए कभी कभी।