जिंदगी जहां ले जाए वो जन्नत
जिंदगी जहां ले जाए उसे ही स्वर्ग मान लें
कहीं भी रुक जाना तो कोई विकल्प नहीं है
जिंदगी एक बहती नदिया के समान है
कभी रास्ते में खूबसूरत पहाड़ और वादियां मिलती हैं
ये शायद बचपन है
फिर नदी का पानी बहते बहते गांव गोट से गुजरने लगता है
खेत खलिहान आ जाते हैं
और फिर शहर आने लगते हैं
उद्योगों और फैक्टरीज का भी आगमन होता है नदी की राह में
तो जाहिर है प्रदूषण भी आता है
और नदियों को जूझना भी पड़ता है
कठिनाई और मुश्किलें तमाम आती हैं हर मोड़ पर
लेकिन नदी रुकती नहीं
भले ही रफ्तार धीमी हो जाए कभी कभार
एक दिन मुक्तिबोध होना अनिवार्य है
मुक्ति रूपी सागर में जाना ही है एक दिन
ये ही जिंदगी का सार है
तो चलते रहिए, बहते रहिए इठला कर
अपनी मस्ती में
नदी की तरह
यात्रा पूरी होगी तो परम आत्मा के पास जाना ही है सबको कभी ना कभी।